- राज्यपाल की योग्यता संविधान के अनुच्छेद 157 में उल्लेख किया गया है और पद को धारण करने के लिये शर्तों का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 158 में वर्णित है।
- सामान्य रूप से राज्यपाल का कार्यकाल 5 वर्ष के लिये होता है, किन्तु संविधान के अनुच्छेद 156 के अधीन राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त अपना पद धारण कर सकता है।
- राज्यपाल को उसके पद व गोपनीयता की शपथ उस राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या उनकी अनुपस्थिति में वरिष्ठतम न्यायाधीश दिलाता है।
- संविधान के अनुसार राज्यपाल के तीन रूप देखने को मिलते हैं, प्रथम राज्य मंत्रिमंडल के सालाह पर चलने वाला, द्वितीय केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने वाला और तृतीय स्वविवेक से कार्य करने वाला, जिसे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को मानना आवश्यक नहीं है।
राज्यपाल को अपने पद धारण करने पर निम्न शक्तियाँ प्राप्त होती है
- कार्यपालकीय शक्तियाँ- राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है। राज्य के समस्त कार्यपालकीय कार्य राज्यपाल के नाम पर ही सम्पादित किये जाते हैं।
- वित्तीय शक्तियाँ- राज्यपाल के सिफारिश के बिना कोई भी धन विधेयक विधानसभा में पेश नहीं किया जा सकता (अनुच्छेद 166-1) है, राज्यपाल की संस्तुति के बिना कोई भी अनुदान माँग प्रस्तुत नहीं किया जा सकता (अनुच्छेद 203-3) है, राज्य का साधारण बजट राज्यपाल द्वारा ही प्रस्तुत किया जाता (अनुच्छेद 202) है। बैठकों
- विधायी शक्तियाँ- राज्यपाल ही विधान मंडल के सदनों की को आहूत करता है, वह दोनों सदनों का सत्रावसान व भंग करने की शक्ति रखता (अनुच्छेद 174-1.2) है।
- न्यायिक शक्तियाँ मृत्युदंड को छोड़कर राष्ट्रपति के समान ही क्षमादान की शक्ति निहित है। अध्यादेश जारी करने की शक्ति राज्यपाल को भी राष्ट्रपति की भांति प्रदेश में अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्राप्त (अनु. 202) है।
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